उत्तरी भारत के पर्वतीय राज्यों – जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड – में प्रकृति का प्रकोप लगातार जारी है। भारी वर्षा, बादल फटने, भूस्खलन और बाढ़ जैसी आपदाओं ने इन क्षेत्रों में जान-माल का भारी नुकसान किया है। नदियां उफान पर हैं, सड़कें और पुल बह गए हैं, और हजारों लोगों का जीवन बुरी तरह प्रभावित हुआ है। इन घटनाओं की बढ़ती संख्या जलवायु परिवर्तन की गंभीर चुनौती की ओर इशारा करती है।
हिमाचल प्रदेश: आपदाओं का बढ़ता ग्राफ
पर्वतीय राज्यों में सबसे ज्यादा खराब हालात हिमाचल प्रदेश के हैं। पिछले तीन वर्षों के आंकड़े बताते हैं कि बादल फटने और भूस्खलन की घटनाएं दो गुना से भी ज्यादा बढ़ी हैं। राज्य के बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुंचा है और कई जानें भी गई हैं।
इस वर्ष मानसून सीजन में अब तक हिमाचल में 42 बार बादल फटे हैं और 86 स्थानों पर भूस्खलन हुआ है। लाहुल-स्पीति में सर्वाधिक 52 बार बाढ़ आई, जबकि कुल्लू में 15, शिमला में 14 और मंडी में 12 स्थानों पर भूस्खलन दर्ज किया गया। मंडी जिले में 18 बार बादल फटने की घटनाएं भी सामने आई हैं।
जलवायु परिवर्तन और भौगोलिक स्थिति: मूल कारण
विशेषज्ञों का मानना है कि पर्वतीय क्षेत्रों में बादल फटने की घटनाओं में वृद्धि का एक प्रमुख कारण जलवायु परिवर्तन है। इसके साथ ही, इन प्रदेशों की भौगोलिक स्थिति भी इन आपदाओं के लिए जिम्मेदार है। पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण भारी वर्षा से जमीन धंसने और मलबा गिरने की आशंका बढ़ जाती है, जिससे भूस्खलन और बाढ़ का खतरा बढ़ जाता है।
जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में तबाही का मंजर
जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में भी आपदाओं ने रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। रविवार रात से बुधवार शाम तक हुई वर्षा ने प्रदेश के आधारभूत ढांचे को पूरी तरह से चरमरा दिया। राजमार्गों समेत दर्जनों सड़कें और पुल बह गए, और रेल यातायात भी बुरी तरह प्रभावित हुआ।
खासतौर पर जम्मू और ऊधमपुर में इंद्रदेव अधिक कुपित नजर आए। 26 अगस्त को सुबह 8.30 बजे से बुधवार सुबह 8.30 तक पूरे पश्चिमी हिमालयी क्षेत्रों में वर्षा के सर्वकालिक रिकॉर्ड ध्वस्त हो गए। ऊधमपुर में इस दौरान 630 एमएम और जम्मू में 300 एमएम वर्षा दर्ज की गई। इससे चिनाब, तवी और झेलम जैसी प्रमुख नदियां लगातार तीन दिनों तक खतरे के निशान से ऊपर बहीं, जिसके परिणामस्वरूप लगभग 45 लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी। इससे पहले, किश्तवाड़ के चशोती में मचैल माता यात्रा मार्ग पर बादल फटने से आई तबाही में 70 लोगों की मौत हो गई थी, और दर्जनों शव अभी भी बरामद नहीं हो पाए हैं।
उत्तराखंड: भूस्खलन का स्थायी खतरा
उत्तराखंड भी इस वर्षाकाल में जगह-जगह भूस्खलन का दंश झेल रहा है। राज्य के 11 जिलों – देहरादून, रुद्रप्रयाग, पिथौरागढ़, चमोली, चंपावत, उत्तरकाशी, बागेश्वर, पौड़ी, नैनीताल, अल्मोड़ा और हरिद्वार – में 4 मई से अब तक बड़े भूस्खलनों की 63 घटनाएं हो चुकी हैं, जिनमें जान-माल का भारी नुकसान हुआ है। उत्तरकाशी के धराली और चमोली के थराली में आई आपदाएं इनमें प्रमुख हैं।
राज्य के सभी जिलों में छोटे-छोटे भूस्खलनों की संख्या ढाई हजार से अधिक है। पिछले वर्ष मई से अगस्त तक राज्य में बड़े भूस्खलनों की 40 घटनाएं हुई थीं, जबकि छोटे-छोटे भूस्खलन की संख्या 1800 से 2000 के बीच थी। इस साल यह आंकड़ा काफी बढ़ गया है, जो चिंता का विषय है।
आंकड़े क्या कहते हैं?
राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में इन आपदाओं की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है:
- बादल फटने की घटनाएं: 2023 में 27 बार, 2024 में 12 बार, और 2025 में 42 बार।
- बाढ़ की घटनाएं: 2023 में 83 बार, 2024 में 39 बार, और 2025 में 90 बार।
- भूस्खलन की घटनाएं: 2023 में 5502 बार, 2024 में 46 बार, और 2025 में 86 बार।
(नोट: यह आंकड़े राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के अनुसार हैं।)
निष्कर्ष: भविष्य की चुनौतियां और तैयारी
उत्तरी भारत के पर्वतीय राज्यों में जारी यह आपदाएं प्रकृति के बदलते मिजाज और जलवायु परिवर्तन के गंभीर परिणामों का स्पष्ट संकेत हैं। जान-माल का नुकसान, बुनियादी ढांचे की क्षति और सामान्य जनजीवन का अस्त-व्यस्त होना एक बड़ी चुनौती बन गया है। इन आपदाओं से निपटने के लिए न केवल बेहतर तैयारी और राहत कार्यों की आवश्यकता है, बल्कि जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने की दिशा में भी ठोस कदम उठाना अनिवार्य है ताकि भविष्य में ऐसी विनाशकारी घटनाओं को रोका जा सके।
