हाड़ौती क्षेत्र की राजनीति के एक बड़े हस्ताक्षर, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता भरत सिंह कुंदनपुर का हाल ही में निधन हो गया, जिसके बाद मंगलवार को उनका अंतिम संस्कार किया गया। प्रदेश की राजनीति में उनकी एक अलग ही पहचान थी, जिसे उनकी सादगी और जनसेवा के प्रति अटूट समर्पण ने गढ़ा था। आइए, जानते हैं उस दिग्गज Congress leader के बारे में, जिन्होंने Rajasthan politics में अपनी एक अनूठी मिसाल पेश की।
एक अनूठी राजनीतिक पहचान
भरत सिंह कुंदनपुर सूबे की सियासत में अपनी अलग ही पहचान रखते थे। उन्होंने कई बार अपनी कार्यशैली से सबका ध्यान खींचा। जब कोई नवनिर्मित ढाँचा बनकर तैयार होता था, तो वे उसके उद्घाटन के लिए पार्टी के किसी बड़े नेता या मुख्यमंत्री को नहीं बुलाते थे, बल्कि मजदूरों से ही उसका शुभारंभ करवाते थे। उन्हें ऐसा करना बेहद पसंद था। यहाँ तक कि चुनाव लड़ने के दौरान भी वे कभी किसी स्टार प्रचारक को नहीं बुलवाते थे और यदि कोई इच्छा भी जाहिर करता था तो उन्हें विनम्रता से मना कर देते थे। विधायक रहते हुए उन्होंने कभी गनमैन नहीं रखा और मंत्री बनने पर भी पुलिस एस्कॉर्ट या अपने आवास पर पुलिस चौकी नहीं लगवाई। यह उनकी सादगी का प्रमाण था।
विरासत में मिली राजनीति, जनता से सीधा जुड़ाव
75 वर्ष की आयु में अंतिम सांस लेने वाले भारत सिंह को राजनीति विरासत में मिली थी। उनके पिता, पूर्व मंत्री और सांसद जुझार सिंह, राजस्थान की पहली विधानसभा के लिए साल 1952 में विधायक चुने गए थे। जुझार सिंह उस समय Hadoti region के झालावाड़ में काफी लोकप्रिय थे और कांग्रेस के दिग्गज नेताओं में शुमार थे। कहा जाता है कि जुझार सिंह राजशाही के दौरान जितने रजवाड़ों के करीब थे, उतने ही जनता से सीधे जुड़े रहे। जनता के कामकाज में सीधा हाथ बंटाकर उन्हें न्याय दिलाने की उनकी परंपरा ने उन्हें लोकप्रिय बनाया। यही गुण उनके बेटे भरत सिंह में भी आए। जुझार सिंह चार बार विधायक रहे और एक बार सांसद व मंत्री भी रहे थे। भरत सिंह भी अपनी लोकप्रियता के चलते चार बार विधायक चुने गए।
NREGA मजदूरों से उद्घाटन की अनोखी पहल
भारत सिंह के 20 साल तक निजी सहायक रहे जगदीश गुप्ता बताते हैं कि पूर्व मंत्री भरत सिंह सादगी से भरे थे और हमेशा गांव के लोगों के बीच रहे। उन्होंने जरूरतमंदों की हमेशा मदद की। गुप्ता कहते हैं कि मंत्री रहते हुए, साल 2008-13 के कार्यकाल में, उन्होंने सांगोद पंचायत समिति के भवन का उद्घाटन महिला NREGA workers से करवाया था। इसके बाद, साल 2018-2023 के विधायक काल के दौरान, उन्होंने परवन नदी के राजगढ़ हाई लेवल ब्रिज और पास में बने पार्क का उद्घाटन भी पांच मनरेगा की महिला मजदूरों से करवाया। इसी तरह, भारत सिंह की गुडला पुल का शुभारंभ भी उन्होंने महिला मजदूरों से ही करवाया था। यह उनकी जन-केंद्रित सोच और श्रम के प्रति सम्मान का प्रतीक था।
विकास कार्यों की गुणवत्ता पर पैनी नजर
गुप्ता बताते हैं कि भरत सिंह कुंदनपुर निर्माण कार्यों की खुद मॉनिटरिंग करते थे और गुणवत्ता का पूरा ध्यान रखते थे। साल 2008-13 के अशोक गहलोत के शासनकाल में, उन्हें पीडब्ल्यूडी मंत्री का जिम्मा दिया गया था। इस दौरान उन्होंने बूंदी जिले के केशवरायपाटन-कापरेन इलाके में बनी एक डामर की सड़क को, जो पिछली बार प्रमोद जैन भाया के मंत्री रहने के वक्त बनी थी और उखड़ गई थी, नए सिरे से बनवाया। भरत सिंह ने कलाकारों के लिए कोटा में बनी आर्ट गैलरी का जीर्णोद्धार भी अपनी देखरेख में करवाया। उन्होंने सोरसन वन क्षेत्र में पर्यटकों के लिए हैरिटेज हट बनवाई, गांव-गांव में यात्री बस स्टैंड, सामुदायिक भवन बनवाए और गांवों को सड़कों से जोड़ा। सांगोद इलाके में पानी का स्तर काफी नीचे था, जिसे देखते हुए उन्होंने उजाड़, परवन और कालीसिंध नदियों पर बड़े निकस (छोटे बांध) बनवाए। कोटा चंबल रिवर फ्रंट की तर्ज पर सांगोद कस्बे में उजाड़ नदी पर रिवर फ्रंट भी बनवाया।
गांधीवादी विचारधारा और समय की पाबंदी
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी से पूर्व मंत्री भरत सिंह काफी प्रभावित थे। जब सांगोद कस्बे से सौंदर्यीकरण के नाम पर गांधी की प्रतिमा हटा दी गई थी, तो उन्होंने लंबा आंदोलन किया और वापस उसी स्थान पर गांधी प्रतिमा स्थापित करवाई। भरत सिंह समय के बड़े पाबंद थे। यदि वे किसी को मिलने का समय देते थे और कोई दो मिनट भी लेट होता था, तो वे मुलाकात नहीं करते थे। यदि किसी कार्यक्रम में उन्हें आमंत्रित किया जाता था, तो भरत सिंह समय से पहले पहुँच जाते थे और कार्यक्रम के चालू होने का इंतजार करते थे। यदि तय समय पर कार्यक्रम शुरू नहीं होता था, तो वे वापस लौट जाते थे। उन्होंने ताउम्र लोगों को समय का पाबंद होने की सीख दी।
दानवीर और मितव्ययी चुनाव प्रचारक
निजी सहायक जगदीश गुप्ता ने बताया कि पूर्व मंत्री भरत सिंह ने करोड़ों रुपये की कीमत की बेशकीमती जमीन—गांव में पार्क, सामुदायिक भवन, चिकित्सालय और पानी की टंकी आदि के लिए—साढ़े 17 बीघा जमीन दान दी। वे कम खर्चे में चुनाव लड़ते थे। पहले चुनाव में उनके 7 लाख रुपए खर्च हुए थे, दूसरे चुनाव में 7.5 लाख रुपए और तीसरा चुनाव उन्होंने मात्र 5 लाख रुपए में लड़ा था। जगदीश कहते हैं कि भरत सिंह गांव-गांव जाते थे, खुद जनसंपर्क करते थे और निरंतर लोगों से उनका संपर्क रहता था। एक चुनाव में नमो नारायण मीणा ने चुनाव प्रचार के लिए आने को कहा था, लेकिन भरत सिंह ने उन्हें मना कर दिया था क्योंकि वे अपना प्रचार खुद ही करना पसंद करते थे।
अशोक गहलोत ने कहा – ‘स्टेट फॉरवर्ड’ थे भरत सिंह
जयपुर के एसएमएस अस्पताल में लंबी बीमारी के दौरान सोमवार रात पूर्व मंत्री भरत सिंह ने अंतिम सांस ली। उनका शव कोटा गुमानपुरा स्थित उनके निजी आवास पर और फिर कोटडी गुमानपुरा रोड स्थित कांग्रेस कार्यालय में लोगों के दर्शन के लिए रखा गया। मोक्ष रथ से उनकी अंतिम यात्रा उनके पैतृक गांव कुंदनपुर पहुँची, जहाँ भरत सिंह पंचतत्व में विलीन हुए। उन्हें अंतिम विदाई देने वालों में प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत सहित कई वरिष्ठ नेता शामिल हुए। मीडिया से बातचीत करते हुए गहलोत ने कहा कि भरत सिंह अपनी बेबाकी के लिए जाने जाते थे। वे ‘स्टेट फॉरवर्ड’ व्यक्ति थे, जो दिल में होता था वह मुंह पर बोल दिया करते थे और कोई संकोच नहीं करते थे। Bharat Singh Kundanpur का जीवन उनकी सादगी, ईमानदारी और जनता के प्रति उनके गहरे समर्पण का एक प्रेरणादायक उदाहरण है, जो Rajasthan politics में हमेशा याद रखा जाएगा।
