देश की राजधानी दिल्ली एक बार फिर धुंध और धुएं की चादर में लिपटने लगी है। सर्दियां अभी दूर हैं, लेकिन Delhi pollution का स्तर चिंताजनक रूप से बढ़ने लगा है। दशकों से राष्ट्रीय राजधानी के वायु प्रदूषण के लिए पराली जलने को मुख्य वजह बताया जाता रहा है, लेकिन अब विशेषज्ञ इस दावे को खारिज कर रहे हैं। सच्चाई यह है कि प्रदूषण की रोकथाम में अपनी नाकामी छिपाने के लिए अक्सर स्थानीय कारकों को नजरअंदाज किया जाता रहा है।
पराली नहीं, स्थानीय कारक हैं वायु प्रदूषण के असली जिम्मेदार
विगत कुछ वर्षों से stubble burning को ही दिल्ली के वायु प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण बताया जाता रहा है। हालांकि, तमाम थिंक टैंक के अध्ययन और विश्लेषण लगातार यह बताते रहे हैं कि दिल्ली के प्रदूषण के लिए स्थानीय कारक जिम्मेदार हैं। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (सीएसई) जैसे प्रतिष्ठित संस्थान भी स्थानीय स्रोतों पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता पर बल देते हैं। अब यह स्पष्ट हो चुका है कि दिल्लीवासियों को स्वच्छ हवा प्रदान करने के लिए सरकार को पहले अपने स्थानीय कारकों पर गंभीरता से काम करना होगा।
बिगड़ती Air Quality: एक गंभीर चेतावनी
सर्दियों की दस्तक अभी नहीं हुई है, लेकिन राजधानी में प्रदूषण का स्तर बढ़ने लगा है। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जो AQI (एयर क्वालिटी इंडेक्स) कुछ ही दिन पहले तक 100 से नीचे यानी संतोषजनक श्रेणी में चल रहा था, वह अब 100 से ऊपर मध्यम श्रेणी में पहुंच गया है। पुणे के इंडियन इंस्टीट्यूट आफ ट्रापिकल मीट्रियोलाजी (आइआइटीएम) के विज्ञानी, जो डिसीजन सपोर्ट सिस्टम (डीएसएस) के जरिये हर वर्ष सर्दियों में दिल्ली के प्रदूषण की निगरानी करते हैं, इसकी पुष्टि करते हैं। एयरोसोल पर अध्ययन करने वाले डा. सचिन दिनकर घुड़े बताते हैं कि भले ही पंजाब और हरियाणा में पराली जलनी शुरू हो गई हो, लेकिन दिल्ली के एक्यूआई में अभी तक इसकी हिस्सेदारी शून्य है। अगले कुछ दिनों तक भी यही स्थिति रहने वाली है।
प्रदूषण के Local Pollution Sources और उनका योगदान
दिल्ली के प्रदूषण में सबसे बड़ी हिस्सेदारी वाहनों से निकलने वाले धुएं की है। सड़कों पर अक्सर लगने वाले यातायात जाम के कारण वाहन सामान्य गति के मुकाबले धीमे चलते हैं या रुक-रुक कर चलते हैं, जिससे ईंधन अधिक जलता है और जहरीली गैसों का उत्सर्जन कई गुना बढ़ जाता है। सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था की लचर स्थिति भी सड़कों पर वाहनों की संख्या बढ़ाती है, जिससे समस्या और गंभीर होती है।
आइआइटीएम और सीएसई के विश्लेषण के अनुसार, दिल्ली में वायु प्रदूषण के प्रमुख स्थानीय कारक और उनकी हिस्सेदारी (प्रतिशत में) इस प्रकार हैं:
- वाहनों का धुआं: 25 प्रतिशत
- कचरा जलाना: 20 प्रतिशत
- सड़कों की धूल: 20 प्रतिशत
- निर्माण व ध्वंस कार्यों की धूल: 15 प्रतिशत
- उद्योगों से निकला धुआं: 10 प्रतिशत
- अन्य स्रोत: 10 प्रतिशत
- पराली: 0 प्रतिशत (वर्तमान में)
इसके अलावा, टूटी सड़कों और निर्माण स्थलों की धूल, औद्योगिक धुआं, कचरा जलाना और मलबा भी प्रदूषण बढ़ाने में योगदान दे रहा है। पड़ोसी एनसीआर के जिलों का प्रदूषण भी दिल्ली की हवा को खराब करने में अपनी भूमिका निभाता है। सीएसई की कार्यकारी निदेशक अनुमिता राय चौधरी के मुताबिक, दिल्ली की हवा में अभी पराली जलने के चलते होने वाले प्रदूषण की हिस्सेदारी नहीं के बराबर है। इसके बावजूद दिल्ली का AQI बढ़ने लगा है, जिसके लिए स्थानीय स्रोतों को ज्यादा जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए। उनका कहना है कि प्रदूषण के लिए केवल पराली को जिम्मेदार ठहराकर बचा नहीं जा सकता है।
समाधान की ओर: ठोस कदम उठाने की आवश्यकता
प्रदूषण नियंत्रण के लिए किए गए उपाय सफल नहीं हुए हैं, इसलिए अब ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है। वाहनों से होने वाले प्रदूषण में कमी लाने के साथ-साथ घरों में जल रहे ईंधन, उद्योगों के उत्सर्जन और निर्माण गतिविधियों से होने वाले धूल प्रदूषण की रोकथाम करना भी बहुत जरूरी है। जब तक हम अपने शहर के भीतर मौजूद local pollution sources को नियंत्रित नहीं करते, तब तक स्वच्छ हवा की कल्पना अधूरी रहेगी। दिल्ली को प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए एक समग्र और केंद्रित रणनीति समय की मांग है।
