अनुराग कश्यप एक ऐसे फिल्मकार हैं, जिन्होंने अपनी अनूठी शैली और बेबाक कहानियों से हिंदी सिनेमा में एक अलग मुकाम बनाया है। ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ जैसी फिल्मों के बाद, उनके हर नए प्रोजेक्ट का बेसब्री से इंतजार रहता है। अब सिनेमाघरों में उनकी नई पेशकश ‘निशांची’ (Nishaanchi) आ चुकी है, जिसमें वे एक बार फिर अपने चिर-परिचित ठेठ देहाती माहौल, बदले की आग और रिश्तों की जटिलताओं के साथ लौटे हैं। क्या ‘निशांची’ दर्शकों को वही पुराना अनुराग कश्यप का जादू दिखा पाती है? आइए जानते हैं इस Nishaanchi Movie Review में।
निशांची की कहानी: बदले और जुनून का खूनी खेल
फिल्म की कहानी दो समानांतर टाइमलाइन में चलती है – वर्तमान और अतीत। वर्तमान में, जुड़वां भाई बबलू और डबलू (दोनों किरदार Aaishvary Thackeray ने निभाए हैं) रिंकू (वेदिका पिंटो) के साथ मिलकर एक बैंक डकैती की असफल कोशिश करते हैं। इस कोशिश में बबलू को 10 साल की जेल हो जाती है, जबकि रिंकू अपने पिता को खोने के बाद नौटंकी के मंच पर नाचने को मजबूर होती है। बबलू उससे जुनूनी मोहब्बत करता है।
कहानी फिर अतीत में जाती है, जहां हम बबलू और डबलू के माता-पिता – मंजरी (मोनिका पंवार), जो एक राज्य-स्तरीय शूटर थी, और जबरदस्त सिंह (विनीत कुमार सिंह), एक उभरते पहलवान, से मिलते हैं। राजनीति, भाई-भतीजावाद और धोखेबाजी उनके सपनों को कुचल देती है। जबरदस्त सिंह का सबसे करीबी दोस्त अंबिका प्रसाद (कुमुद मिश्रा) ही उसका सबसे बड़ा दुश्मन निकलता है, जो उसकी हत्या करवाता है और उसकी संपत्ति व विधवा मंजरी पर सालों से नजर गड़ाए रखता है।
अतीत और वर्तमान के धागे तब उलझते हैं जब बबलू बड़ा होकर उसी अंबिका प्रसाद के लिए काम करने लगता है। अंबिका उसे इस्तेमाल करके अखाड़े के मुखिया का खून करवाता है और बबलू को जेल भिजवाता है। जेल से लौटने के बाद बबलू और भी बेलगाम हो जाता है। अब वह रिंकू से दीवानगी की हद तक प्यार करता है, भले ही वही उसके पिता का हत्यारा भी है। कहानी में सबसे बड़ा टकराव तब आता है जब बबलू, अपने चाचा समान अंबिका प्रसाद के खिलाफ रिंकू के लिए बगावत करता है। बदले, प्यार और विरासत के इस खूनी खेल में हर रिश्ता खून से सना है और हर मोड़ पर कहानी और खतरनाक होती जाती है।
अनुराग कश्यप का निर्देशन और फिल्म की बारीकियां
Anurag Kashyap हमेशा से रिश्तों की पेचीदगियों, इंसानी मन के अंधेरे पहलुओं और विषमताओं को पर्दे पर उतारने में माहिर रहे हैं। ‘निशांची’ में भी वे दर्शकों को कानपुर के ठेठ देहाती माहौल में ले जाते हैं, जहां हर फ्रेम और हर किरदार असली प्रतीत होता है। देहाती बोली, पहनावा और जमीन से जुड़े किरदार, सब मिलकर एक प्रामाणिक Bollywood Crime Drama का अनुभव देते हैं।
फिल्म कई मायनों में ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ की याद दिलाती है, लेकिन इस बार इमोशनल आर्क और गहरा है। तकरीबन तीन घंटे की अवधि थोड़ी लंबी लग सकती है, लेकिन यह कई किरदारों और विस्तृत कहानी को देखते हुए जायज लगती है। सिल्वैस्टर फोंसेका की सिनेमैटोग्राफी शानदार है, जो माहौल और मूड को बखूबी पकड़ती है। देहाती गीत-संगीत कहानी के ताने-बाने में फिट बैठते हैं, हालांकि कुछ जगहों पर वे गति को धीमा करते हैं। कई दिशाओं में फैली इस कहानी को एक धागे में पिरोते हुए, क्लाइमैक्स में ‘निशांची पार्ट 2’ की घोषणा भी सामने आती है।
अभिनय: दमदार कलाकारों का प्रभावशाली प्रदर्शन
अभिनय के मामले में ‘निशांची’ एक बेहद मजबूत फिल्म है। डबल रोल में Aaishvary Thackeray का यह डेब्यू प्रदर्शन चौंकाने वाला है। उन्होंने चालबाज बबलू और भोले-भाले डबलू के बीच गजब का संतुलन साधा है, जिससे दोनों किरदार बिल्कुल अलग और जीवंत लगते हैं।
नवोदित वेदिका पिंटो ने रिंकू की भूमिका में सहजता और दृढ़ता से काम किया है। उनके अभिनय में मासूमियत और आंतरिक दृढ़ता दोनों झलकती है। मोनिका पंवार मां के रूप में असरदार हैं, वहीं अखाड़े के पहलवान जबरदस्त सिंह के रूप में विनीत कुमार सिंह अपनी पूरी ताकत और प्रामाणिकता के साथ छा जाते हैं। कुमुद मिश्रा ने अंबिका प्रसाद के लालच और कुटिलता को बारीकी से उतारा है, जो याद रह जाता है। मोहम्मद जीशान अयूब भ्रष्ट पुलिस अफसर के रोल में प्रभावशाली हैं, और राजेश कुमार ने भी अपने किरदार को दमदार अंदाज में निभाया है। कश्यप ने छोटे-मोटे किरदारों को भी नजरअंदाज नहीं किया है, और हर चरित्र कहानी में अपनी जगह बनाता है। यही वजह है कि फिल्म का अभिनय पक्ष इसकी सबसे बड़ी खूबी बनकर उभरता है।
क्यों देखें ‘निशांची’?
अगर आप Anurag Kashyap के डार्क सिनेमा और उनके दमदार क्राफ्ट के प्रशंसक हैं, तो ‘निशांची’ आपके लिए एक बेहतरीन विकल्प हो सकती है। यह फिल्म बदले, जुनून, धोखे और रिश्तों की जटिलताओं का एक गहन अनुभव देती है। इस Hindi Film Review के बाद हमारी सलाह है कि आप इसे सिनेमाघरों में जाकर देखें। कुल मिलाकर, ‘निशांची’ एक ऐसी फिल्म है जो आपको बांधे रखती है और सोचने पर मजबूर करती है।



