दुनिया भर में अल्ज़ाइमर रोग एक बड़ी स्वास्थ्य चुनौती बना हुआ है। इसके इलाज और जांच पर अरबों डॉलर खर्च किए गए हैं, लेकिन अब तक कोई निश्चित उपचार सामने नहीं आया था। हाल ही में इस दिशा में कुछ ऐसी महत्वपूर्ण प्रगति हुई है, जिसने मरीजों और उनके परिवारों के लिए एक नई उम्मीद जगाई है। दो नई दवाएं और एक नवीनतम ब्लड टेस्ट (Alzheimer’s blood test) इस जटिल बीमारी से लड़ने की एक नई आशा लेकर आए हैं।
अल्ज़ाइमर की नई दवाएं: कितनी प्रभावी, कितनी महंगी?
अमेरिकी कंपनियों एली लिली और बायोजेन ने अल्ज़ाइमर (Alzheimer’s treatment) के इलाज के लिए दो नई दवाएं विकसित की हैं – ‘डोनानेमाब’ और ‘लेकेनेमाब’। ये ‘Alzheimer’s new drugs’ बीमारी के शुरुआती चरणों में दिए जाने पर इसकी प्रगति को धीमा करने का दावा करती हैं। हालांकि, इनकी प्रभावशीलता को लेकर विशेषज्ञ अभी भी पूरी तरह आश्वस्त नहीं हैं और इसका असर सीमित समय तक ही दिखता है।
इन दवाओं की सबसे बड़ी चुनौती इनकी कीमत और गंभीर साइड इफेक्ट्स हैं। ये दवाएं बहुत महंगी हैं और इनके दुष्प्रभाव, जैसे मस्तिष्क में रक्तस्राव (ब्रेन हेमरेज), चिंता का विषय हैं। यही वजह है कि अलग-अलग देशों ने इन पर अलग-अलग निर्णय लिए हैं। अमेरिका में इन्हें मंजूरी मिल चुकी है, लेकिन फ्रांस और ब्रिटेन जैसे देशों ने इन्हें अपनी बीमा प्रणाली में शामिल नहीं किया है। उनका मानना है कि ये दवाएं अपनी कीमत के मुकाबले पर्याप्त फायदा नहीं देतीं।
क्रांतिकारी ब्लड टेस्ट: अल्ज़ाइमर का शुरुआती निदान
अल्ज़ाइमर का निदान पहले काफी तकलीफदेह और महंगा होता था। कमर में सूई लगाकर लिक्विड निकालने की प्रक्रिया, जिसे ‘लम्बर पंक्चर’ कहते हैं, आम थी। अब एक नया ब्लड टेस्ट (Alzheimer’s blood test) विकसित किया गया है, जो रोग के ‘बायोमार्कर’ यानी जैविक संकेतकों का पता लगा सकता है। यह टेस्ट न केवल कम तकलीफदेह है, बल्कि शुरुआती चरण में ही ‘Dementia’ के लक्षणों की पहचान करने में मदद कर सकता है।
अमेरिका में इस ब्लड टेस्ट को मान्यता मिल चुकी है, लेकिन यूरोपीय विशेषज्ञों में अभी भी इसे लेकर संदेह है। वे मानते हैं कि केवल बायोमार्कर से अल्ज़ाइमर का पूरा और सही निदान नहीं किया जा सकता। उनके अनुसार, अभी भी मानसिक और कार्यक्षमता से जुड़ी विस्तृत जांच की जरूरत है, ताकि ‘Brain health’ का सटीक आकलन किया जा सके।
जीवनशैली की भूमिका: क्या रोकथाम ही असली कुंजी है?
हाल के शोध से पता चला है कि जीवनशैली की कुछ खराब आदतें अल्ज़ाइमर के खतरे को काफी बढ़ा सकती हैं। इनमें मोटापा, धूम्रपान, शराब का अत्यधिक सेवन, शारीरिक निष्क्रियता और सुनने की समस्या जैसे कारक शामिल हैं। ‘द लैंसेट’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, लगभग 50% मामलों में इन कारकों की भूमिका हो सकती है।
यही वजह है कि अब विशेषज्ञ इस बात पर जोर दे रहे हैं कि लोगों को स्वस्थ जीवनशैली अपनाने के लिए कैसे प्रेरित किया जाए। हालांकि अभी तक किए गए प्रयोगों में यह स्पष्ट असर नहीं दिखा कि जीवनशैली में सुधार करने से अल्ज़ाइमर को पूरी तरह रोका जा सकता है, फिर भी हाल ही में किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि दो साल तक मार्गदर्शन और सहायता लेने वाले मरीजों की मानसिक स्थिति में थोड़ी बहुत गिरावट जरूर कम हुई। यह दर्शाता है कि सक्रिय जीवनशैली ‘Alzheimer’s treatment’ का एक महत्वपूर्ण पूरक हो सकती है।
आशा और वास्तविकता का संतुलन
अल्ज़ाइमर जैसी जटिल बीमारी में हालिया प्रगति निश्चित रूप से राहत देती है, लेकिन यह कहना जल्दबाजी होगी कि अब इसका पूर्ण इलाज मिल गया है। जहां नई दवाएं कुछ राहत देती हैं, वहीं उनका असर सीमित और साइड इफेक्ट्स गंभीर हो सकते हैं। ब्लड टेस्ट से जल्द निदान संभव है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल एक महत्वपूर्ण कदम है, अंतिम समाधान नहीं।
लंबे समय तक चलने वाले शोध, नए ‘Alzheimer’s new drugs’ और ‘Alzheimer’s blood test’ पर अधिक अध्ययन, साथ ही स्वस्थ जीवनशैली अपनाने के निरंतर प्रयास ही यह तय करेंगे कि क्या ये उपाय वास्तव में ‘Dementia’ के खिलाफ असरदार हथियार बन सकते हैं और समग्र ‘Brain health’ को बेहतर कर सकते हैं।
