दिल्ली की चमकती सड़कों पर रात के अंधेरे में अक्सर स्ट्रीट लाइट्स की कमी महसूस होती है। यह सिर्फ एक संयोग नहीं, बल्कि एक गंभीर समस्या है जो शहर की व्यवस्था पर सवाल खड़े करती है। गुणवत्ता से समझौते ने दिल्ली की स्ट्रीट लाइट्स को समय से पहले ही बेकार कर दिया है, जिसकी मुख्य वजह MCD, PWD और NDMC की स्ट्रीट लाइट व्यवस्था में बरती गई लापरवाही है। यह नागरिकों की सुरक्षा और सरकार के खजाने दोनों पर भारी पड़ रहा है।
करोड़ों का दावा, लाखों घंटे की धोखाधड़ी: 2014 की LED लाइट्स का सच
वर्ष 2014 में, MCD ने अपने क्षेत्र में लगे सोडियम लैंप्स को हटाकर 3 लाख 96 हजार 970 नई LED लाइट्स लगाई थीं। उस वक्त यह दावा किया गया था कि इन LEDs की औसत आयु 50,000 घंटे जलने की होगी। लेकिन, जमीनी हकीकत इस दावे से कोसों दूर है। इन लाइट्स के लगाए जाने और बदले जाने की संभावित तारीखों से साफ पता चलता है कि इनमें से अधिकांश ने अपनी औसत आयु पूरी नहीं की।
इनकी जलने की अवधि का अगर हम मानक समय (शाम 6:30 बजे से सुबह 5:30 बजे तक, लगभग 11 घंटे प्रतिदिन) के हिसाब से आकलन करें, तो जुलाई 2014 से 31 अगस्त 2025 तक कुल 4080 दिन होते हैं, जिसमें लीप ईयर के अतिरिक्त दिन भी शामिल हैं। इस अवधि में LED लाइट्स के जलने का कुल समय 44,880 घंटे बनता है।
यह 50,000 घंटे के दावे से लगभग सवा पांच हजार घंटे कम है। अगर इसमें विद्युत कटौती, रखरखाव, LED failure और डिमिंग (रात 12 बजे के बाद ऊर्जा खपत कम करने के लिए लाइट की तीव्रता कम करना) के कारण होने वाली अनिवार्य 10 प्रतिशत बंदी को भी शामिल कर लिया जाए, तो यह अवधि घटकर 40,392 घंटे रह जाती है। यह स्पष्ट संकेत देता है कि 2014 में किया गया 50 हजार घंटे का दावा, कटौती और डिमिंग के बावजूद खरा नहीं उतरा, जबकि डिमिंग का एक अतिरिक्त लाभ LED की उम्र बढ़ाना भी होता है।
लापरवाही का बोझ: जनता पर 600 करोड़ का अतिरिक्त खर्च
MCD की इस लापरवाही और शासकीय कार्य के प्रति बरती गई कर्तव्यहीनता के कारण सरकार को करोड़ों का नुकसान हुआ है। समय से पहले ही खराब हुई LEDs को बदलने के लिए नए टेंडर के तहत सरकार पर 600 करोड़ रुपए का अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है। विडंबना यह है कि नए टेंडर में भी 50,000 घंटे जलने का वही पुराना दावा दोहराया जा रहा है, जो पहले ही गलत साबित हो चुका है। यह साफ तौर पर government loss को दर्शाता है, जिसका खामियाजा अंततः करदाताओं को भुगतना पड़ता है।
यह स्थिति MCD negligence का ज्वलंत उदाहरण है, जो शहर की रोशनी के लिए जिम्मेदार मुख्य संस्था है। आंकड़ों के अनुसार, MCD को इस वर्ष जनवरी से सितंबर के बीच स्ट्रीट लाइट्स से संबंधित 1,800 से अधिक शिकायतें प्राप्त हुई हैं। आज भी MCD के पास 59,579 सोडियम लैंप (एचपीएसवी) बताए जाते हैं, जबकि कुछ अनुमानों के अनुसार यह संख्या 80 हजार के करीब हो सकती है। ईस्ट जोन में 1 सितंबर 2025 से ई-स्मार्ट और साउथ-नॉर्थ में हैवल्स स्ट्रीट लाइट का काम संभाल रही हैं, लेकिन करोल बाग और समता विहार जैसे कई क्षेत्रों में स्ट्रीट लाइट की दयनीय स्थिति अधिकांश इलाकों को अंधेरे में डुबोए हुए है।
अन्य विभागों का भी यही हाल: PWD और NDMC की स्ट्रीट लाइट्स
सिर्फ MCD ही नहीं, PWD lights का हाल भी कुछ ऐसा ही है। PWD के पास 96,736 लाइट्स (46,000 एचपीएसवी और 50,000 एलईडी) हैं, जिनमें से औसतन 20 से 30 प्रतिशत अक्सर खराब रहती हैं। इस वर्ष अब तक स्ट्रीट लाइट को लेकर 2,080 शिकायतें दर्ज की गईं, जिनमें से 653 अभी भी लंबित हैं। अब PWD सामान मासिक किश्त योजना (EMI मॉडल) पर 90,000 स्मार्ट LED लगाने की योजना बना रही है।
NDMC के क्षेत्र में लगभग 15 हजार स्मार्ट LED और 104 हाई मास्ट लाइट हैं। इनमें से भी 10 से 15 प्रतिशत में अक्सर खराबी आती है, और अब तक 500 से अधिक शिकायतें इनकी गुणवत्ता की पोल खोलने को काफी हैं। हालांकि, NDMC की मॉनिटरिंग और रखरखाव का स्तर MCD और PWD से बेहतर बताया जाता है, लेकिन समस्या वहां भी बनी हुई है। पूरी दिल्ली की सड़कें, जहाँ Delhi street lights की पर्याप्त व्यवस्था होनी चाहिए, आज भी अंधेरे से जूझ रही हैं।
निष्कर्ष: जवाबदेही और गुणवत्ता की है सख्त जरूरत
दिल्ली की स्ट्रीट लाइट्स की यह स्थिति न केवल नागरिकों के लिए असुविधाजनक है बल्कि सुरक्षा के दृष्टिकोण से भी चिंताजनक है। करोड़ों रुपए खर्च होने के बावजूद अगर लाइट्स अपनी तय अवधि पूरी नहीं कर पा रही हैं, तो यह सीधे तौर पर जवाबदेही और गुणवत्ता नियंत्रण की कमी को दर्शाता है। सरकार और संबंधित एजेंसियों को इस गंभीर समस्या पर तत्काल ध्यान देना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि भविष्य में होने वाले टेंडरों में केवल दावों पर नहीं, बल्कि वास्तविक गुणवत्ता और प्रदर्शन पर जोर दिया जाए, ताकि दिल्ली की सड़कें हमेशा जगमगाती रहें।



