पिछले चार सालों में सोने ने लगातार बेहतर प्रदर्शन किया है। इसकी एक बड़ी वजह है सेंट्रल बैंकों और सॉवरेन वेल्थ फंड्स की बढ़ती हुई सोने की खरीद, जिसमे 2021 से अब तक दोगुनी वृद्धि हुई है। लेकिन ज्वेलरी की मांग कम हुई है क्योंकि ऊंची कीमतों ने खपत को प्रभावित किया है। हाल ही में डॉयचे बैंक की एक रिपोर्ट ने इस रहस्य से पर्दा उठाया है और चीन के ‘छुपे हुए सोने के खेल’ का खुलासा किया है।
चीन का ‘साइलेंट बायर’ गेम
रिपोर्ट के अनुसार, 2022 में रूस पर प्रतिबंध और उसके सेंट्रल बैंक एसेट्स के फ्रीज होने के बाद, कई देशों ने डॉलर या यूरो रिज़र्व के ब्लॉक होने के जोखिम को समझा। इसलिए, कई नॉन-G7 देशों (ख़ासकर चीन) ने अपने रिज़र्व में विविधता लाने के लिए सोने में निवेश करना शुरू कर दिया। सोना एक ऐसी संपत्ति है जिसे किसी भी देश की राजनीति प्रभावित नहीं कर सकती।
IMF के आंकड़ों और वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के आंकड़ों में बड़ा अंतर है। रिपोर्ट बताती है कि दो-तिहाई आधिकारिक सोने की मांग अब रिपोर्ट नहीं की जा रही है। डॉयचे बैंक का अनुमान है कि 2020 से अब तक 78% अनरिपोर्टेड सोने की मांग चीन से आई है, जिससे चीन ‘साइलेंट बायर’ बन गया है और उसकी खरीद ही सोने की कीमतों को ऊपर रखे हुए है।
चीन कैसे खरीद रहा है सोना?
डॉयचे बैंक की विधि के अनुसार, चीन के सोने के आयात और उत्पादन में से ज्वेलरी, ETF, औद्योगिक उपयोग और IMF को रिपोर्टेड मांग घटाने पर जो हिस्सा बचता है, उसे ‘अन्य निवेश मांग’ कहा जाता है। यही हिस्सा IMF के आंकड़ों में नहीं दिखता, लेकिन WGC और बाजार में इसका प्रभाव दिखाई देता है।
सोने की कीमतों पर क्या असर?
अगर चीन और अन्य सेंट्रल बैंकों की तेज खरीद जारी रहती है, तो कीमतें ऊंची बनी रहेंगी। डॉयचे बैंक का अनुमान है कि 2025 की चौथी तिमाही में सोने का भाव अंतर्राष्ट्रीय बाजार में $3,350 प्रति औंस और 2026 में औसतन $3,700 प्रति औंस हो सकता है। लेकिन अगर चीन की मांग कम हुई, तो सोने की कीमतें गिरेंगी और ज्वेलरी की मांग बढ़ेगी।
यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि वर्तमान में सोना बाजार की 80% मांग चीन पर निर्भर है। अगर चीन अपनी नीति बदलता है या रिज़र्व प्रबंधन में बदलाव करता है, तो कीमतों पर भारी गिरावट आ सकती है।
भारत पर क्या असर?
चीन की छुपी हुई खरीद ने सोने की कीमतें $3,300-$3,700/औंस तक पहुंचा दी हैं। इसका मतलब है कि भारतीय निवेशकों को, जिन्होंने पहले ही सोना पोर्टफोलियो में रखा है, मजबूत रिटर्न मिलता रहेगा, लेकिन नई खरीद महंगी होगी। SIP या लंबी अवधि की खरीद अच्छी है, लेकिन अल्पकालिक व्यापार जोखिम भरा है।
ऊंची कीमतों से घरेलू खपत प्रभावित हो रही है, जिससे ज्वेलरी व्यापारियों को त्योहारी सीजन में भी दिक्कत हो सकती है। भारतीय ज्वेलरी की प्रतिस्पर्धा भी कम हो रही है क्योंकि चीन की सोने की मांग वैश्विक कीमतों को बढ़ा रही है। RBI को भी महंगे दाम पर सोने का भंडार बढ़ाना पड़ सकता है, जिससे रिज़र्व की लागत बढ़ेगी, लेकिन डॉलर पर निर्भरता भी कम होगी।
महंगे सोने का मतलब है करंट अकाउंट डेफिसिट (CAD) पर दबाव और मुद्रास्फीति में वृद्धि। भारतीय निवेशकों को एकदम से पूरी पूंजी सोने में नहीं लगानी चाहिए। सर्वोत्तम तरीका है मल्टी-एसेट पोर्टफोलियो बनाना – इक्विटी + सोना + फिक्स्ड इनकम। भारत को सोने के आयात पर निर्भरता कम करने और रीसाइक्लिंग/डिजिटल सोने पर ध्यान केंद्रित करने की ज़रूरत है।
