देश में वस्तु एवं सेवा कर (GST) व्यवस्था लागू हुए आठ वर्ष पूरे हो चुके हैं। जीएसटी ने भारत की कर प्रणाली में क्रांतिकारी बदलाव लाया और विभिन्न अप्रत्यक्ष करों को एकीकृत कर एकल कर व्यवस्था की शुरुआत की। इसकी सबसे बड़ी खासियत है कि कर संग्रहण और भुगतान अब पहले से कहीं अधिक पारदर्शी, सरल और तकनीकी आधारित हो गया है।
वर्तमान में भारत में जीएसटी की मुख्य दरें चार हैं—5 प्रतिशत, 12 प्रतिशत, 18 प्रतिशत और 28 प्रतिशत। इसके अलावा, कुछ विशेष वस्तुओं और सेवाओं पर 0.25 प्रतिशत, 1.5 प्रतिशत और 3 प्रतिशत तक की दरें भी लागू होती हैं। विभिन्न वस्तुओं और सेवाओं को इन दरों में वर्गीकृत किया गया है। इन दरों को जीएसटी काउंसिल समय-समय पर देश की आर्थिक जरूरतों और उद्योगों की मांग के अनुसार संशोधित करती है।
व्यवसायों के लिए, जीएसटी पेमेंट की प्रक्रिया को लगातार अपडेट किया जा रहा है। 1 अप्रैल 2025 से इनपुट सर्विस डिस्ट्रीब्यूटर (ISD) रजिस्ट्रेशन की बाध्यता लागू की गई है। जिन कंपनियों के एक से अधिक जीएसटीएन (GSTIN) हैं और वे अपने विभिन्न यूनिट्स में साझा इनपुट सर्विसेज जैसे किराया, ऑडिट फीस, सॉफ्टवेयर लाइसेंस आदि का उपयोग करती हैं, उन्हें अब अनिवार्य रूप से ISD रजिस्ट्रेशन कराना होगा। इससे इनपुट टैक्स क्रेडिट के वितरण एवं लेखांकन में पारदर्शिता बढ़ेगी। विशेषज्ञ मानते हैं कि इस बदलाव से बहीखातों में गड़बड़ी की संभावना कम होगी और व्यवसायों को कर रिटर्न भरने में भी सुविधा मिलेगी।
जीएसटी के अंतर्गत इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) की व्यवस्था व्यवसायों के लिए विशेष रूप से फायदेमंद रही है। इस प्रावधान के माध्यम से, व्यवसाय उन वस्तुओं व सेवाओं पर दिए गए जीएसटी को अपने अंतिम कर दायित्व से घटा सकते हैं। हालांकि, कुछ सामानों और सेवाओं के लिए इनपुट टैक्स क्रेडिट नहीं मिलता, जिसकी सूची सरकार ने निर्धारित की हुई है। यह व्यवस्था टैक्स के दोहरे प्रभाव को रोकती है और केवल असली ‘वैल्यू ऐडिशन’ पर टैक्स लगने को सुनिश्चित करती है।
कुछ निश्चित स्थितियों में रिवर्स चार्ज मैकेनिज्म (RCM) भी लागू होता है। उदाहरण स्वरूप, यदि किसी पंजीकृत व्यवसायी को किसी अनरजिस्टर्ड सप्लायर से खरीदारी करनी है, या कुछ विशेष सेवाएँ जैसे कानूनी सेवा या परिवहन सेवा ली जाती है, तो ऐसे में टैक्स देने की जिम्मेदारी प्राप्तकर्ता की होती है। इसके लिए स्वयं चालान बनाना, अलग से जीएसटी पेमेंट करना और बाद में उसे अपनी रिटर्न में दिखाना आवश्यक होता है।
आज, जीएसटी ने छोटे व मझोले व्यवसायों (MSMEs) को भी राहत दी है। जहाँ पहले विभिन्न राज्यों में अलग-अलग टैक्स कानूनों की वजह से छोटे व्यापारियों को अतिरिक्त बोझ झेलना पड़ता था, वहीं अब ₹40 लाख तक के सालाना कारोबार पर जीएसटी रजिस्ट्रेशन छूट है। इससे लाखों व्यापारियों को लाभ मिला है। उपभोक्ताओं के लिए भी जीएसटी के तहत वस्तुएँ और सेवाएँ अधिक सस्ती हुई हैं और आपूर्ति श्रृंखला तेज हो गई है।
आईटी आधारित ई-वे-बिल और इन्फोर्स्मेंट सिस्टम्स ने कर चोरी की संभावना को कम किया है। वहीं, सरकार ने हाल ही में जीएसटी पोर्टल पर टू-फैक्टर अथेंटिकेशन को लागू कर डिजिटल सुरक्षा मजबूत की है।
आठ वर्षों में जीएसटी का सफर निरंतर सुधार और डिजिटलकरण की ओर बढ़ रहा है। विशेषज्ञों की राय में आगामी समय में जीएसटी परिषद दरों का पुनर्मूल्यांकन कर सकती है, छोटे और मझोले उद्योगों के लिए और सुविधाएँ जोड़ी जा सकती हैं और ई-इनवॉइस व ई-वे-बिल प्रक्रिया में तकनीकी सुधार किए जा सकते हैं। व्यापार जगत को सरकार की नीतियों और जीएसटी सम्बंधित अद्यतनों पर नजर बनाए रखने की सलाह दी जाती है ताकि वे समय पर अनुपालन कर सकें और संभावित लाभ का पूरा उपयोग कर सकें।
