हाल ही में तेल निर्यातक देशों के समूह OPEC+ द्वारा लिए गए एक महत्वपूर्ण फैसले ने वैश्विक तेल बाजार में हलचल मचा दी है। इस फैसले के तहत, नवंबर से तेल उत्पादन में मामूली बढ़ोतरी की घोषणा की गई है, जिसने भारत जैसे प्रमुख तेल आयातकों के लिए निराशा पैदा कर दी है। भारत को बड़ी राहत की उम्मीद थी, लेकिन यह बढ़ोतरी ऊंट के मुंह में जीरा साबित हुई, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में Crude Oil Prices में करीब 1% का उछाल देखने को मिला।
ओपेक+ का अहम फैसला: उम्मीदें और हकीकत
ओपेक+ समूह ने नवंबर से प्रतिदिन 1,37,000 बैरल (बीपीडी) की मामूली बढ़ोतरी करने का निर्णय लिया है। यह बढ़ोतरी अक्टूबर में हुई वृद्धि के बराबर ही है। भारत बेसब्री से इस फैसले का इंतजार कर रहा था क्योंकि उसे उम्मीद थी कि एक बड़ी बढ़ोतरी अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों को नरम कर सकती है, जिससे घरेलू स्तर पर पेट्रोल और डीजल की कीमतों में राहत मिलती। समूह के बड़े हिस्सेदार सऊदी अरब की भी यही इच्छा थी, लेकिन रूस मामूली उत्पादन बढ़ोतरी के पक्ष में था। रूस तेल की कीमतों पर अतिरिक्त दबाव डालने से बचना चाहता था, खासकर यूक्रेन युद्ध को लेकर लगे प्रतिबंधों के कारण उसके लिए Russia Oil Production बढ़ाना भी मुश्किल है।
भारत को फायदे के बजाय नुकसान क्यों?
भारत अपनी तेल की जरूरत का 85% से अधिक आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में Crude Oil Prices में कोई भी बदलाव उस पर सीधा असर डालता है। 1.37 लाख बीपीडी की बढ़ोतरी Global Oil Market में कुल मांग का एक बहुत छोटा हिस्सा है। भारत को अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में बड़ी गिरावट देखने के लिए कम से कम 10-15 लाख बीपीडी या इससे भी अधिक की बढ़ोतरी की जरूरत थी। इस मामूली बढ़ोतरी के कारण, यह संदेश गया कि आपूर्ति में खास इजाफा नहीं होगा, जिससे तेल की कीमतों में गिरावट के बजाय तेजी आई। चूंकि भारत अपनी India Oil Imports पर अत्यधिक निर्भर है, इसलिए कच्चे तेल की कीमतों में नरमी उसके लिए बेहद फायदेमंद होती। घरेलू बाजार में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में राहत के लिए कम से कम 10% की गिरावट आवश्यक है।
रूस और सऊदी अरब के अलग-अलग हित
मीटिंग से पहले, सूत्रों ने बताया कि रूस 1,37,000 बीपीडी उत्पादन बढ़ाने के पक्ष में था, ताकि कीमतों पर अतिरिक्त दबाव न पड़े। वहीं, सऊदी अरब चाहता था कि यह बढ़ोतरी दोगुनी, तिगुनी या चौगुनी हो (2,74,000 बीपीडी से 5,48,000 बीपीडी तक) ताकि वह अपनी बाजार हिस्सेदारी जल्दी से वापस पा सके। सऊदी अरब के पास अतिरिक्त उत्पादन क्षमता मौजूद है और वह इसका उपयोग तेजी से बाजार हिस्सेदारी हासिल करने के लिए करना चाहता है। यह मतभेद स्पष्ट रूप से OPEC+ के भीतर विभिन्न देशों के आर्थिक और रणनीतिक हितों को दर्शाता है।
वैश्विक आर्थिक मंदी और प्रतिबंधों का साया
विश्लेषकों का मानना है कि सोमवार को तेल की कीमतों में तेजी मुख्य रूप से ओपेक+ के उम्मीद से कम उत्पादन बढ़ाने के फैसले की वजह से आई है। समूह का इरादा तेल बाजारों में हालिया गिरावट को संभालने का था। हालांकि, वैश्विक आर्थिक मंदी की आशंकाओं के कारण Crude Oil Prices कमजोर बनी रह सकती हैं। इसके अतिरिक्त, अमेरिका और यूरोप की ओर से रूस और ईरान पर लगाए जा रहे सख्त प्रतिबंधों के कारण आपूर्ति में आने वाली रुकावटें भी Global Oil Market पर असर डाल रही हैं। यूक्रेन लगातार रूसी ऊर्जा सुविधाओं पर हमले तेज कर रहा है, जिससे Russia Oil Production पर दबाव बढ़ रहा है। G7 देशों के वित्त मंत्रियों ने भी रूस पर दबाव बढ़ाने के लिए ऐसे कदम उठाने की बात कही है जो रूसी तेल की खरीद बढ़ाने वालों को निशाना बनाएंगे। भारत रूसी तेल खरीदता है, और इन वैश्विक भू-राजनीतिक गतिविधियों का असर उसकी India Oil Imports पर भी पड़ सकता है।



