लोक गायिका Neha Singh Rathore को इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ से बड़ा झटका लगा है। कोर्ट ने उनके खिलाफ दर्ज प्राथमिकी (FIR) को रद्द करने की याचिका खारिज कर दी है। यह मामला उनके कथित अनर्गल और देश विरोधी बयानों से जुड़ा है, जो उन्होंने इंटरनेट मीडिया पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और भाजपा के खिलाफ दिए थे।
अभिव्यक्ति की आज़ादी और उसकी सीमाएँ
कोर्ट ने इस मामले में Freedom of Speech पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की। माननीय न्यायालय ने कहा कि अभिव्यक्ति की आज़ादी नागरिकों का मौलिक अधिकार है, किंतु संविधान इस पर युक्तियुक्त प्रतिबंध लगाने की बात भी कहता है। इस मामले में दर्ज प्राथमिकी और विवेचना के दौरान अब तक आए सबूतों से साफ है कि नेहा सिंह राठौर ने प्रथम दृष्टया अपराध किया है। इसी आधार पर, FIR Quashing की याचिका को स्वीकार नहीं किया जा सकता।
क्या है पूरा मामला?
नेहा सिंह राठौर के खिलाफ लखनऊ के हजरतगंज थाने में 27 अप्रैल, 2024 को प्राथमिकी दर्ज की गई थी। उन पर पहलगाम में 26 पर्यटकों का धर्म पूछकर हत्या करने के मामले पर कथित अनर्गल व देश विरोधी बयानबाजी करने का आरोप है। नेहा ने अपने Social Media Controversy पोस्ट में प्रधानमंत्री के नाम का कथित तौर पर अपमानजनक तरीके से इस्तेमाल किया और भाजपा पर अपने निहित स्वार्थों के लिए पाकिस्तान के साथ युद्ध छेड़ने का आरोप भी लगाया था। एक पोस्ट में उन्होंने यहां तक कहा था कि पहलगाम आतंकी हमले के बाद मोदी बिहार आए ताकि पाकिस्तान को धमका सकें।
हाई कोर्ट का आदेश और आगे की राह
Allahabad High Court की लखनऊ खंडपीठ ने नेहा सिंह राठौर की याचिका खारिज करते हुए आदेश दिया है कि वह 26 सितंबर को विवेचक के सामने पूछताछ के लिए हाजिर हों और पुलिस रिपोर्ट दाखिल होने तक जांच में सहयोग करती रहें। जस्टिस राजेश सिंह चौहान व जस्टिस एस क्यू एच रिजवी की पीठ ने अपने आदेश में जांच में भाग लेने का निर्देश दिया है।
बचाव पक्ष और सरकारी अधिवक्ता के तर्क
नेहा सिंह राठौर के वकील ने तर्क दिया कि उन्हें भारत के संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत सोशल मीडिया पर अपने विचार व्यक्त करने का मौलिक अधिकार है, और राज्य का कोई भी प्राधिकारी ऐसे मौलिक अधिकार का उल्लंघन नहीं कर सकता। हालांकि, सरकारी अधिवक्ता डॉक्टर वीके सिंह ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि याची ने संविधान में प्रदत्त अभिव्यक्ति की आज़ादी के दायरे का उल्लंघन किया है। उन्होंने न केवल प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और भाजपा के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी की है, बल्कि उस समय देश विरोधी बयानबाजी की जब पाकिस्तान के साथ तनाव चरम पर था। सरकारी अधिवक्ता ने यह भी बताया कि नेहा के बयानों ने पाकिस्तान में इंटरनेट मीडिया पर काफी प्रशंसा बटोरी थी, और बिहार चुनावों को लेकर भी उनकी बयानबाजी अभिव्यक्ति की आज़ादी की सीमा के बाहर थी। विवेचना के दौरान नेहा के खिलाफ काफी सबूत मिले हैं और विवेचना नियमानुसार चल रही है, जिसमें अदालत के हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।
निष्कर्ष
यह मामला अभिव्यक्ति की आज़ादी की सीमाओं और उसके दुरुपयोग के बीच की महीन रेखा को दर्शाता है। Neha Singh Rathore को अब जांच में सहयोग करना होगा और देखना होगा कि इस Social Media Controversy में आगे क्या कानूनी मोड़ आता है। कोर्ट का यह फैसला दर्शाता है कि मौलिक अधिकार असीमित नहीं होते और उन पर युक्तियुक्त प्रतिबंध लागू होते हैं।



