इंदौर का सराफा बाजार, जो अपने स्वर्णिम आभूषणों और रात की लजीज खाने-पीने की चौपाटी के लिए विश्व विख्यात है, इन दिनों एक नए राजनीतिक विवाद का अखाड़ा बन गया है। इस विवाद के केंद्र में हैं शहर के महापौर पुष्यमित्र भार्गव और क्षेत्रीय विधायक मालिनी गौड़, जिनके बीच सराफा चौपाटी के भविष्य को लेकर टकराव की स्थिति उत्पन्न हो गई है। भाजपा संगठन ने इस टकराव को टालने और स्थिति को संभालने के लिए भोपाल तक रिपोर्ट भेजी है।
क्या है सराफा चौपाटी विवाद?
सराफा बाजार में रात के समय लगने वाली खाने-पीने की चौपाटी दशकों से इंदौर की पहचान रही है। महापौर पुष्यमित्र भार्गव ने हाल ही में घोषणा की थी कि इस चौपाटी की 80 पुरानी दुकानें 1 सितंबर से फिर से लग सकेंगी। यह निर्णय जहां एक ओर कुछ लोगों को राहत देने वाला था, वहीं इसने सराफा बाजार के मुख्य व्यापारियों के बीच असंतोष पैदा कर दिया। व्यापारियों का एक वर्ग इस चौपाटी को पूरी तरह से हटाए जाने की मांग कर रहा है।
व्यापारियों की मांग और महापौर का रुख
सराफा बाजार के व्यापारियों द्वारा इस चौपाटी को पूरी तरह से हटाने की मांग की जा रही है। उनका तर्क है कि रात की यह चौपाटी उनके व्यवसाय को प्रभावित करती है और सुरक्षा संबंधी चिंताएं भी बढ़ाती है। हालांकि, महापौर ने व्यापारियों की इस मांग को स्पष्ट रूप से नकार दिया है, जिससे गतिरोध और बढ़ गया। इस गतिरोध ने स्थानीय राजनीति में एक नया मोड़ ले लिया है।
विधायक मालिनी गौड़ की दो टूक चेतावनी
इस मामले में तब नया मोड़ आ गया, जब क्षेत्र की विधायक मालिनी गौड़ ने हस्तक्षेप किया। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि ‘मेरे क्षेत्र का फैसला कोई और नहीं ले सकता।’ विधायक के इस बयान ने महापौर और उनके बीच सीधा टकराव पैदा कर दिया, जिससे राजनीतिक गलियारों में हलचल मच गई। यह बयान इस बात का संकेत है कि विधायक अपने क्षेत्र के मामलों में किसी बाहरी हस्तक्षेप को स्वीकार नहीं करेंगी।
भाजपा संगठन की हस्तक्षेप की पहल
दोनों प्रमुख जनप्रतिनिधियों के बीच बढ़ते इस टकराव को देखते हुए भाजपा संगठन ने पहल की है। स्थिति को बिगड़ने से बचाने के लिए भाजपा की प्रदेश इकाई को पूरे मामले की रिपोर्ट भेज दी गई है। सूत्रों के अनुसार, भाजपा नगर अध्यक्ष सुमित मिश्रा ने वरिष्ठ पदाधिकारियों को मामले की जानकारी देते हुए उनसे मार्गदर्शन मांगा है। ऐसा समझा जाता है कि भाजपा नगर इकाई इस मामले में हस्तक्षेप करते हुए सभी संबंधित जनप्रतिनिधियों की एक बैठक भी बुला सकती है ताकि सर्वमान्य हल निकाला जा सके और इस विवाद को जल्द से जल्द शांत किया जा सके।
आगे क्या?
इंदौर के सराफा चौपाटी का यह विवाद अब केवल स्थानीय मुद्दा न रहकर, भाजपा के आंतरिक प्रबंधन और जनप्रतिनिधियों के बीच समन्वय की भी परीक्षा बन गया है। देखना होगा कि संगठन इस संवेदनशील मामले को कैसे सुलझाता है और सराफा की पहचान बनी इस चौपाटी का भविष्य क्या होता है। इस पूरे मामले पर सभी की निगाहें टिकी हुई हैं।



