झारखंड की सियासत में इन दिनों ‘भारत रत्न’ को लेकर जबरदस्त हलचल मची हुई है। दिशोम गुरु शिबू सोरेन को देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान दिलाने के लिए विधानसभा में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित तो हो गया, लेकिन नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी के एक दांव ने सत्ताधारी गठबंधन (इंडिया ब्लॉक) को बैकफुट पर धकेल दिया है। मरांडी ने शिबू सोरेन के साथ-साथ झारखंड आंदोलन के दो अन्य महान नायकों – मरांग गोमके जयपाल सिंह मुंडा और विनोद बिहारी महतो – को भी ‘भारत रत्न’ देने की मांग उठाकर सियासी पारा चढ़ा दिया है। आखिर क्या है इस सियासी उठापटक के पीछे की कहानी, आइए जानते हैं।
दिशोम गुरु शिबू सोरेन को ‘भारत रत्न’ का प्रस्ताव: एक ऐतिहासिक पहल
झारखंड विधानसभा के मानसून सत्र के अंतिम दिन, 28 अगस्त 2025 को, शिबू सोरेन को ‘भारत रत्न’ देने का प्रस्ताव ध्वनिमत से पारित किया गया। यह प्रस्ताव अब केंद्र सरकार को भेजा जाएगा। झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के संस्थापक और राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन का हाल ही में 4 अगस्त 2025 को दिल्ली के सर गंगा राम अस्पताल में निधन हो गया था। उनके निधन के बाद से ही उन्हें यह सम्मान देने की मांग उठ रही थी। परिवहन मंत्री दीपक बिरुआ ने प्रस्ताव पेश करते हुए कहा कि दिशोम गुरु ने आदिवासियों, किसानों, मजदूरों और शोषितों के अधिकार व सम्मान के लिए अपना जीवन समर्पित किया। उन्होंने अलग झारखंड राज्य के लिए ऐतिहासिक संघर्ष किया और वे मात्र एक राजनीतिक नेता नहीं, बल्कि एक विचार और आंदोलन थे। उन्हें भारत रत्न देना सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
मरांडी का ‘मास्टर स्ट्रोक’: दो और नायकों की मांग ने बदला सियासी माहौल
विधानसभा में प्रस्ताव का समर्थन करते हुए भाजपा नेता और नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने एक ऐसा दांव चला, जिसने सत्ताधारी गठबंधन की चिंताएं बढ़ा दीं। मरांडी ने कहा कि यह एक ऐतिहासिक निर्णय है, लेकिन उन्होंने विनोद बिहारी महतो और मरांग गोमके जयपाल सिंह मुंडा के नाम भी प्रस्ताव में जोड़ने का सुझाव दिया। राजनीतिक गलियारों में इसे बाबूलाल मरांडी का ‘मास्टर स्ट्रोक’ माना जा रहा है, जिसने सत्ताधारी झामुमो, कांग्रेस और राजद गठबंधन को असहज स्थिति में डाल दिया है। इन दोनों बड़े नेताओं को नजरअंदाज करने का आरोप उनकी राजनीतिक स्थिति को कमजोर कर सकता है।
सत्ता पक्ष की दुविधा: विरोधियों के निशाने पर गठबंधन
मरांडी की इस मांग ने सत्ताधारी दलों के लिए मुश्किलें खड़ी कर दी हैं। वे इस मुद्दे पर बेहद सावधानी से अपनी बात रख रहे हैं। झामुमो विधायक और पूर्व मंत्री हेमलाल मुर्मू ने कहा कि विनोद बिहारी महतो और जयपाल सिंह मुंडा को भी भारत रत्न मिले, इस पर उन्हें कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन अभी देशभर में शिबू सोरेन को भारत रत्न देने का माहौल है। वहीं, झामुमो के मुख्य सचेतक मथुरा महतो ने कहा कि फिलहाल शिबू सोरेन को भारत रत्न देने की बात हो रही है, बाद में विनोद बिहारी महतो और जयपाल सिंह मुंडा का नाम भी भेजा जाएगा।
आजसू की चेतावनी: विनोद बिहारी महतो को नज़रअंदाज़ करना पड़ेगा भारी
आजसू के मांडू विधायक तिवारी महतो ने इस मुद्दे पर सत्ताधारी गठबंधन को चेतावनी दी है। उन्होंने कहा कि विनोद बिहारी महतो और जयपाल सिंह मुंडा के योगदान को झारखंड की राजनीति में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि विनोद बिहारी महतो के सान्निध्य और सहयोग से ही शिबू सोरेन ‘दिशोम गुरु’ बन सके। तिवारी महतो ने जोर देकर कहा कि झारखंड निर्माण में महतो, निर्मल महतो, एके रॉय और जयपाल सिंह मुंडा जैसे नेताओं की भूमिका को भुलाकर कोई राजनीति नहीं कर सकता। अगर इनके नाम भी प्रस्ताव में शामिल होते, तो विधानसभा की गरिमा और बढ़ती।
क्या यह सिर्फ राजनीति है? पक्ष और विपक्ष के तर्क
भाजपा प्रवक्ता प्रदीप सिन्हा ने बाबूलाल मरांडी की मांग का बचाव करते हुए कहा कि उनके नेता ने झारखंड आंदोलन के दो बड़े नेताओं विनोद बिहारी महतो और जयपाल सिंह मुंडा को भारत रत्न देने की सलाह दी है और इसमें न तो कोई राजनीति है और न ही किसी को गुमराह करने की कोशिश। वहीं, झामुमो और कांग्रेस ने इस पर पलटवार किया है। झामुमो के केंद्रीय प्रवक्ता मनोज पांडेय ने मरांडी पर निशाना साधते हुए पूछा कि जब वे झारखंड के मुख्यमंत्री रहे हैं, तब उन्होंने इन नामों के लिए भारत रत्न की मांग क्यों नहीं उठाई थी? उन्होंने इसे ‘महतो और मुंडा समाज की राजनीति’ करार दिया। कांग्रेस विधायक और कृषि मंत्री शिल्पी नेहा ने भी मरांडी की मांग को कोरी राजनीति बताते हुए कहा कि अगर बाबूलाल मरांडी की मंशा विनोद बिहारी महतो और जयपाल सिंह मुंडा को भारत रत्न दिलाने की थी, तो ‘डबल इंजन’ की सरकार में ऐसा क्यों नहीं हुआ था?
शिबू सोरेन की विरासत और बदलता सियासी समीकरण
दिशोम गुरु शिबू सोरेन ने झारखंड आंदोलन को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई थी। उनके निधन के बाद भी उनकी राजनीतिक विरासत राज्य की सियासत में केंद्र में बनी हुई है। विधानसभा में पारित प्रस्ताव और बाबूलाल मरांडी की मांग ने न केवल शिबू सोरेन की विरासत को, बल्कि झारखंड आंदोलन के अन्य प्रमुख नेताओं के योगदान को भी एक बार फिर चर्चा में ला दिया है। यह प्रस्ताव अब केंद्र सरकार के पास भेजा जाएगा, लेकिन मरांडी के इस दांव ने सत्ताधारी गठबंधन को नए सियासी समीकरणों पर विचार करने के लिए मजबूर कर दिया है। यह देखना दिलचस्प होगा कि केंद्र सरकार इस पर क्या निर्णय लेती है और झारखंड की राजनीति में इस पर आगे क्या भूचाल आता है।



