भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ फिल्में ऐसी होती हैं, जो सिर्फ मनोरंजन नहीं करतीं, बल्कि समाज को एक नई दिशा भी देती हैं। ऐसी ही एक फिल्म थी ‘आखिर क्यों?’, जिसने आज से ठीक 40 साल पहले, 7 अक्टूबर 1985 को रिलीज होकर इतिहास रच दिया था। यह सिर्फ एक ड्रामा फिल्म नहीं थी, बल्कि महिला सशक्तिकरण और भावनाओं की एक नई भाषा गढ़ने वाली एक क्रांतिकारी कृति थी। इस फिल्म की नायिका, दिग्गज अदाकारा Smita Patil थीं, जिन्होंने अपने अभिनय से इस कहानी को अमर कर दिया।
एक नायिका जिसने भारतीय सिनेमा में रचा इतिहास
Smita Patil, जिनका नाम सुनते ही गंभीर, सशक्त और यथार्थवादी सिनेमा की तस्वीर उभरती है, बचपन से ही अभिनय और ड्रामा की शौकीन थीं। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत थिएटर और समानांतर सिनेमा से की थी, जहां लगभग पांच साल तक वह अपनी कला को निखारती रहीं। साल 1975 में श्याम बेनेगल की फिल्म ‘चरणदास चोर’ से उन्होंने अपने एक्टिंग करियर का आगाज किया। हालांकि, मुख्यधारा की फिल्मों की ओर उनका रुख आसान नहीं था, लेकिन ‘आखिर क्यों?’ ने साबित कर दिया कि उनका अभिनय किसी भी पॉपुलर फिल्म में भी गहराई और सहजता से समा सकता है। उन्होंने अपने करियर में हर बड़े स्टार के साथ काम किया, जिनमें अमिताभ बच्चन के साथ ‘नमक हलाल’ और साल 1987 में Rajesh Khanna के साथ ‘नजराना’ जैसी फिल्में शामिल हैं।
‘आखिर क्यों?’: एक क्रांतिकारी कहानी
‘आखिर क्यों?’ सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि समाज के लिए एक दर्पण थी। यह उस समय की Bollywood classic फिल्मों में महिला सशक्तिकरण की एक ऐसी कहानी लेकर आई, जो कला और मुख्यधारा के बीच की लकीर को मिटाती थी। फिल्म की कहानी निशा शर्मा (Smita Patil) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो शादीशुदा होने के बावजूद परिस्थितियों में फंसकर खुद की तलाश में निकल पड़ती है। शांत और विनम्र निशा, जो अक्सर आंसू बहाती है, अपने पति कबीर (राकेश रोशन) से अपने व्यवहार में बदलाव की भीख मांगती है। लेकिन यही उसकी वास्तविक शक्ति का आधार बनता है।
निशा शर्मा: चुपचाप संघर्ष से सशक्तिकरण तक
फिल्म का पहला भाग निशा के रोने-धोने में गुजरता है, लेकिन दूसरे हिस्से में उसकी मुलाकात खुद से होती है। इस दौरान वह हमेशा उन पुरुषों के बीच रहती है, जो उसके लिए निर्णय लेना चाहते हैं। लेकिन निशा चिल्लाकर या शोर मचाकर नहीं, बल्कि स्पष्ट और दृढ़ होकर अपने निर्णय खुद लेने की ताकत दिखाती है। यहीं उसका अनूठा Female Empowerment दिखाई देता है। यह किसी भाषण जैसा नहीं, बल्कि एक अलग और मार्मिक तरीके से प्रस्तुत किया गया था। यह फिल्म उस दौर की दूसरी फिल्मों से अलग थी, जहां पत्नी गिड़गिड़ाती है और जब पति नहीं मानता तो तुरंत उसके खिलाफ खड़ी हो जाती है। ‘आखिर क्यों?’ में निशा अंतिम क्षण तक कोशिश करती है, पति से बदलने की गुहार लगाती है, और जब वह नहीं बदलता, तो मजबूरी में अपने अस्तित्व की तलाश में निकल पड़ती है। उसके संघर्ष, उसके आंसू उसकी कमजोरी नहीं, बल्कि ताकत का प्रमाण बनते हैं – उसके चरित्र के विकास और आत्म-परिवर्तन का अहम हिस्सा।
विरासत और प्रभाव: भारतीय सिनेमा में स्मिता पाटिल
एक क्षण ऐसा भी आता है जब कबीर हैरान होकर कहता है कि उसने कभी निशा को कोई शब्द कहते नहीं सुना। निशा जवाब देती है कि वह बतौर पत्नी अपनी जिम्मेदारी निभाने में व्यस्त थी। यह एक झटके जैसा है, क्योंकि असल में वह कह रही होती है कि उसने उसे कभी परखा ही नहीं। शर्मीला और शांत होना कमजोर होने का पर्याय नहीं है। वह जताना चाहती है कि कबीर, अपने संकीर्ण विचारों के कारण, समझ ही नहीं पाया कि महिलाएं केवल उसकी परिभाषा में नहीं बंधतीं। निशा नाम का किरदार शोर नहीं मचाता, दबंगई से अपनी बात साबित करने पर नहीं तुलता, बल्कि सादगी और सहजता से अपनी बात बिना लाग-लपेट के रखने में यकीन रखता है। यह वह feminism है जो जोर-जबरदस्ती या आंदोलनकारी नायिका वाला नहीं है, बल्कि अपने सशक्त और संवेदनशील स्वरूप में उतना ही प्रभावशाली और असरदार है। Smita Patil ने इस किरदार के जरिए भारतीय सिनेमा में एक ऐसी मिसाल कायम की, जो आज भी प्रेरणा देती है।



