क्या आप जानते हैं कि कुपोषण (Undernutrition) सिर्फ कमज़ोर या दुबले-पतले शरीर का संकेत नहीं है, बल्कि यह मोटापा (Obesity) और टाइप-2 डायबिटीज (Type-2 Diabetes) जैसी गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का भी एक बड़ा कारण बन रहा है? हाल ही में सामने आई एक नई रिसर्च ने इस चौंकाने वाले दावे को वैज्ञानिक रूप से पुष्ट किया है। यह अध्ययन पोषण की कमी और हमारे शरीर पर इसके दीर्घकालिक प्रभावों को समझने में एक नई दिशा देता है।
कुपोषण: एक नया दृष्टिकोण
अक्सर हम कुपोषण का मतलब सिर्फ पोषण की कमी के कारण होने वाले दुबलेपन से लगाते हैं। लेकिन विशेषज्ञ अब बताते हैं कि पोषण की कमी, विशेष रूप से सही पोषक तत्वों के असंतुलन से, शरीर में अप्रत्याशित बदलाव आ सकते हैं। यह बदलाव अक्सर गरीब और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों में देखा जाता है, जहाँ लोग सस्ते, शुगर और फैट युक्त भोजन का सेवन करते हैं। ऐसे भोजन में कैलोरी तो होती है, लेकिन आवश्यक पोषक तत्वों की कमी होती है, जिससे वजन बढ़ने और टाइप-2 डायबिटीज का जोखिम बढ़ जाता है। इतना ही नहीं, माताओं में कुपोषण का असर उनके बच्चों पर भी पड़ता है, जिनमें भविष्य में मोटापा और मेटाबॉलिज्म (Metabolism) संबंधी समस्याएं होने का खतरा बढ़ जाता है।
बिगड़ा मेटाबॉलिज्म: मोटापे और डायबिटीज की जड़
डॉ. राजीव जयदेशन और डॉ. संजीव गलांडे जैसे विशेषज्ञों का मानना है कि कुपोषण के कारण मोटापा और डायबिटीज बढ़ने का सबसे बड़ा कारण शरीर के मेटाबॉलिज्म (Metabolism) में गड़बड़ी है। जब शरीर को पर्याप्त पोषण नहीं मिलता, तो मेटाबॉलिज्म की प्रक्रिया प्रभावित होती है और धीरे-धीरे धीमी पड़ने लगती है। इस स्थिति में शरीर “energy-saving mode” में चला जाता है, यानी मिली-जुली एनर्जी को खर्च करने के बजाय बचाने और फैट के रूप में जमा करने लगता है। यह एक ऐसी सुरक्षात्मक प्रणाली है जो भविष्य में एनर्जी की कमी से निपटने के लिए होती है, लेकिन यही प्रक्रिया आगे चलकर गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं पैदा करती है।
जब ऐसे लोग बाद में ज्यादा कैलोरी वाला भोजन, जैसे शुगर और फैट से भरपूर फास्ट फूड खाते हैं, तो उनका शरीर उस अतिरिक्त एनर्जी को और भी तेजी से फैट के रूप में जमा करता है। यदि इसके साथ उनकी जीवनशैली भी कम एक्टिव हो, तो मोटापा और टाइप-2 डायबिटीज का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। इस तरह, कुपोषण (Undernutrition) और मोटापा (Obesity) अब एक “दोहरे बोझ” के रूप में सामने आ रहे हैं।
वैज्ञानिक अध्ययन: पीढ़ियों तक असर
एक वैज्ञानिक अध्ययन में भारतीय शोधकर्ताओं द्वारा चूहों पर कुपोषण के प्रभावों को समझने की कोशिश की गई। इस शोध में 50 पीढ़ियों तक चूहों को अलग-अलग पोषण स्तर का आहार दिया गया। जिन चूहों को लंबे समय तक कम पोषण वाला खाना मिला, उनमें कई तरह के शारीरिक बदलाव देखे गए। उनके शरीर में इंसुलिन का स्तर अधिक पाया गया, जबकि विटामिन बी12 और फोलेट जैसे आवश्यक पोषक तत्वों की कमी हो गई।
सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि ये बदलाव सिर्फ उन्हीं चूहों तक सीमित नहीं रहे, बल्कि उनकी आने वाली दो पीढ़ियों तक भी इसका असर दिखाई दिया। इसका मतलब है कि जब बाद में उन चूहों को सामान्य और संतुलित भोजन भी दिया गया, तब भी कुपोषण के प्रभाव पूरी तरह से खत्म नहीं हुए। यह शोध स्पष्ट रूप से दिखाता है कि कुपोषण (Undernutrition) शरीर को एनर्जी बचाने और फैट जमा करने के लिए तैयार कर देता है। यही स्थिति आगे चलकर मोटापा और टाइप-2 डायबिटीज जैसी गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं को जन्म देती है। इससे यह भी पता चलता है कि बचपन में पोषण की कमी का असर आने वाली पीढ़ियों तक रह सकता है, जो एक बड़ी Health चुनौती है।
विशेषज्ञों के सुझाव और आगे की राह
पब्लिक हेल्थ एक्सपर्ट डॉ. समीर भाटी जैसे विशेषज्ञ इस समस्या से निपटने के लिए कुछ महत्वपूर्ण सुझाव देते हैं:
- लोगों को सस्ता और पौष्टिक खाना आसानी से उपलब्ध होना चाहिए।
- अस्वस्थ, प्रोसेस्ड और जंक फूड के विज्ञापनों पर रोक लगनी चाहिए।
- लोगों को संतुलित आहार और स्वस्थ जीवनशैली अपनाने के लिए जागरूक करना जरूरी है।
- स्कूलों और समुदायों में पोषण शिक्षा और किफायती स्वस्थ भोजन कार्यक्रम बच्चों और गरीब परिवारों के लिए बेहद फायदेमंद होंगे।
नियमित व्यायाम, हेल्दी डाइट और समय-समय पर स्वास्थ्य जांच मोटापा और डायबिटीज से बचाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। सरकार और स्वास्थ्य संगठनों को मिलकर इस “कुपोषण के दोहरे बोझ” को कम करने के लिए नीतियों और जागरूकता कार्यक्रमों को प्राथमिकता देनी चाहिए ताकि सभी को बेहतर Health मिल सके।



